दो लब्ज़ों की हे दिल की काहानी -भाग 1

"बनिता"ऊठ जाओ बेटी। आज दूद वाला नहीं आने वाला ,पिताजी भी नहीं हे तुम्हें ही लाना पड़ेगा। अब जल्दी जाओ बरना दूद ख़तम हो जायेगा। उठ जाओ बीटा जल्दी। ..... सुभे के १० बजने वाले हे। .... पंडितजी(पिताजी) के प्यार ने बिगाड़ दिया हे।

उम्र कब निकल गया पता ही नहीं चला। माँ हमेसा ही मुझे कहती रही वक़्त किसी का सगा नहीं हे। आज समझ में आ रहा हे। उत्तरप्रदेश के एक छोटेसे गांव से आना होता हे हमारा। पिताजी पंडित हे। घर के बड़ी बेटी हे हम ,एक छोटा भाई भी हे हमारा। पिताजी का काफी नाम हे आस पास के इलाकों में। हमे बड़े प्यार से पाला  हे उन्होंने। स्वभाब से एक दम सांत हे हमारे पिताजी। भगबान पे काफी गेहरी आस्था हे उनकी। और माँ, वो तो हम सबकी आत्मा हे। घर को घर माँ ने ही तो बनाया हे। जिन्दगी एक फिसलती हुई डोर हे जिससे मेने कईं  बार थामने की कोशिश की पर न थाम  सकी । आज नौकरी लग गयी हे मुंबई में। सुबह सुबह उठने पे माँ की बेहद  याद आती हे। अगले महीने जब जाउंगी तो माँ के गोद  में सर रख के सो जाउंगी। यहाँ नींद भी तो नहीं  आती ठीकसे।  

दिन का तो चलो ठीक ठाक हे ,पर ये रात की खामोशियों का क्या किया जाये। क्या ये रात वाकई में इतनी गेहरी होती हे। अक्सर छत  पे जाकर  बैठा करती हूँ , उन खामोशियों को महसूस करने की जुस्तजू में अक्सर आंखे नम  हो जाती हे। पिताजी की एक बात याद आजाती हे की वो अक्सर काहा करते "जीबन में हमे कमजोर नहीं होना हे वल्कि खुद को इतना मजबूत बनाना हे की हम किसी को सहारा देने लायक बन सके "..... 

इस भाग दौड़ से भरी सेहर में आपका अपना कोई नहीं ये बात जानने में मुझे ज्यादा दिन नहीं लगे। जीने की होड़ में इंसान जीने का मतलब ही भूल चूका हे। पर एक बात समझ में आचुकी हे की आप इस भीड़ में  खड़े नहीं रह सकते, आपको भी भागना होगा।  इंसानी जज़्बात  की कीमत यहाँ सिर्फ इतनी हे के हवाओं को मुठी में कैद करने की एक नाकाम कोशिश जितनी। खेर आपको जीना तो होगा ही। सपने हमे जीने का नया आसार देती हैं। पर उनकी कीमत चुकापाना बेहत मुश्किल। आज की रात भी पुरानी रातो जैसी ही हे। दिसम्बर का महीना हे आसमानो में सर्दी  की एक हलकी फुलकी लहर भी मेहसूस हो रही हे। लेकिन गाडिओं की सोर देर रात तक आपके कानो में दस्तक देती रहेंगी। हमारा गांव तो अब चेन की सांसे लेके सो गया होगा। माँ और पिताजी भी सो गए होंगे ,या फिर वो दोनों भी मेरी तरा अपने आँखों से झूट बोल रहे होंगे।
आज ऑफिस से आने के बाद माँ से बात हुई , माँ के प्यारे प्यारे दो बातें सुनके आंखोसे जजबात गिरने लगे। बड़ी मुस्किलसे संभाला मेने खुद को। जिद भी तो मेने ही कि थी । गाऊँ में क्या हे ? यहाँ कुछ नहीं मिलने वाला। बड़े सेहर में नौकरी की अछि स्कोप हे। मेने ही मनाया था उन दोनों को। स्टेशन छोड़ने आयेथे मेरे पिताजी मुझे। यूँ तो बहत मजबूत दिल के हे , पर उनके आंखे भी मुझे जाने की इजाजत नहीं दे पा रहेथे उसदिन। ऐसा कहाँ लिखा हे एक पिता को अपने जज्बात दिखने का हक़ नहीं हे ? बस उनके लब्ज़ खामोस थे, वो अलग बात हे। हमारी एक दीदी रहती थी मुंबई में उनके भरोसे ही पिताजी ने हमे हमारे सपने पूरा करने भेजदिया यहाँ। मुंबई पहंचा तो दीदी आईथी स्टेशन मुझे लेने। पहली बार अपने आंखोके दायरे को में बढ़ा रहीथी,  तो आंखे थी के अपने आप पे यकीं नहीं कर रहे थे। मुंबई ,सपनो का सेहर। ......... क्या वाकई में ?

                        कहानी का अगला भाग पढ़े निचे दिए गए "NEXT" बटन पर क्लिक करके पढ़े 

 PART 2



Post a Comment

0 Comments